महिला आरक्षण विधेयक को लेकर केंद्र सरकार से प्रवक्ता गोपाल दादा तिवारी का सवाल
पुणे। भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर की जयंती के अवसर पर महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता गोपालदादा तिवारी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार की “चुनाव-जीवी राजनीति” देशहित के बजाय राजनीतिक लाभ पर केंद्रित है।
तिवारी ने कहा कि डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर का उद्देश्य सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों का उत्थान और समानता स्थापित करना था, लेकिन “नारी शक्ति वंदन” संशोधन विधेयक के माध्यम से उस मूल भावना को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में चुनाव को ध्यान में रखते हुए महिलाओं की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए केंद्र सरकार बार-बार विधेयक में बदलाव कर रही है, जो केवल सत्ता प्राप्ति की राजनीति को दर्शाता है।
गोपाल दादा तिवारी ने कहा कि वर्ष 2023 में नए संसद भवन में प्रस्तुत “नारी शक्ति वंदन” विधेयक के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई, लेकिन इसे 2029 से लागू करने का प्रावधान रखा गया है। इसका कारण जनगणना और उसके आधार पर होने वाली निर्वाचन क्षेत्रों की पुनर्रचना (डिलिमिटेशन) प्रक्रिया को बताया गया है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी शुरू से ही महिला आरक्षण के पक्ष में रही है और इसी कारण इस विधेयक को समर्थन दिया गया। तिवारी ने यह भी दावा किया कि देश में सबसे पहले स्थानीय स्वराज संस्थाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण देने का कार्य पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने किया था।
कांग्रेस प्रवक्ता ने सोनिया गांधी के बयान का हवाला देते हुए कहा कि केंद्र सरकार महिला आरक्षण विधेयक को जल्दबाजी में केवल राजनीतिक लाभ के लिए ला रही है, जबकि असली मुद्दा निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन का है।
उन्होंने यह भी कहा कि महिला आरक्षण में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान आवश्यक है। साथ ही, जाति-आधारित जनगणना को टालने की केंद्र सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाए गए।
तिवारी ने उदाहरण देते हुए कहा कि बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों ने कम समय में जातीय जनगणना पूरी कर ली, तो केंद्र सरकार इसमें देरी क्यों कर रही है।
उन्होंने आगे कहा कि लोकसभा की सीटों की पुनर्रचना केवल गणितीय आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक न्याय को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। दक्षिण भारत के उन राज्यों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए जिन्होंने शिक्षा और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर कार्य किया है।
कांग्रेस प्रवक्ता गोपालदादा तिवारी ने इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्ष 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा की सरकार के दौरान महिला आरक्षण विधेयक पेश किया गया था, लेकिन विरोध के कारण इसे पारित नहीं किया जा सका। बाद में वर्ष 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में, सोनिया गांधी के प्रयासों से राज्यसभा में यह विधेयक पारित हुआ था।
कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि महिला आरक्षण का समर्थन करते हुए भी वह यह सुनिश्चित करना चाहती है कि इसमें सभी वर्गों, विशेषकर पिछड़े और वंचित समाज की महिलाओं को न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व मिले।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें