पुणे। पुणे महानगरपालिका चुनाव में महा विकास आघाड़ी (एमवीए) की एकजुटता इस बार टूटती नजर आ रही है। कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के बीच बना गठबंधन पुणे में कायम नहीं रह सका है। शरद पवार गुट ने इस चुनावी समन्वय से खुद को अलग कर लिया है, जिससे एमवीए का समीकरण कमजोर पड़ा है।
इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद अब पुणे महानगरपालिका चुनाव में कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) मिलकर चुनाव लड़ेंगी। दोनों दलों के बीच चुनावी तालमेल को लेकर सहमति बनी है और संयुक्त रूप से चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी की जा रही है। हालांकि, सीटों के बंटवारे को लेकर अंतिम निर्णय अभी होना बाकी है फिर भी दोनों दलों की ओर से आज अपने-अपने उम्मीदवारों को नामांकन फॉर्म भरने के लिए कह दिया गया जिसके बाद उन्होंने नामांकन फॉर्म भर दिया है। बताया जा रहा है कि जहां एबी फॉर्म नहीं जमा हो पाए हैं उसे बाद में जमा करने का ऑप्शन है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, शरद पवार गुट के अलग होने से एमवीए की रणनीति को झटका जरूर लगा है, लेकिन कांग्रेस और शिवसेना उद्धव ठाकरे का गठबंधन शहरी मतदाताओं और पारंपरिक समर्थकों को साधने की कोशिश में जुटा है। कांग्रेस अपने संगठनात्मक ढांचे और परंपरागत वोट बैंक के भरोसे चुनाव लड़ेगी, वहीं शिवसेना (उद्धव) मराठी अस्मिता, स्थानीय मुद्दों और शहर से जुड़े सवालों को प्रमुखता से उठाने की रणनीति अपना रही है।
सूत्रों के अनुसार, दोनों दलों के बीच संयुक्त प्रचार अभियान, साझा घोषणापत्र और वार्ड-स्तरीय रणनीति को लेकर बातचीत अंतिम चरण में है। नामांकन प्रक्रिया और उम्मीदवारों के चयन को लेकर भी समन्वय किया जा रहा है, ताकि आपसी टकराव से बचा जा सके।
ध्यान रहे राष्ट्रवादी सरत चंद्र पवार के अलग होने के बाद डॉक्टर प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन विकास आघाड़ी के साथ गठबंधन और सीट शेयरिंग की चर्चा पिछले दो दिनों से चल रही थी परंतु यह गठबंधन बनते बनते अंतिम समय में टूट गया और इसकी घोषणा खुद डॉक्टर प्रकाश आंबेडकर ने की।
बताया जा रहा है कि अब शिवसेना उद्धव ठाकरे के साथ महाराष्ट्र नवन निर्माण सेना इस गठबंधन में शामिल है। हालांकि मनसे को शिवसेना अपने कोटे से सीटें दे रही है।
पुणे महानगरपालिका चुनाव में अब मुकाबला और अधिक रोचक व बहुकोणीय होने के संकेत हैं। सत्तारूढ़ दलों, कांग्रेस–शिवसेना (उद्धव) गठबंधन और अन्य राजनीतिक दलों के बीच कड़ा संघर्ष तय माना जा रहा है। बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच यह देखना अहम होगा कि पुणे का मतदाता किसे सत्ता की चाबी सौंपता है।
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