महाविकास आघाड़ी की सीट-साझेदारी ने बढ़ाई कांग्रेस की बेचैनी, पुणे में भीतरघात के आरोप

लवकुश तिवारी 
वरिष्ठ पत्रकार
पुणे। पुणे महानगरपालिका चुनाव से पहले महाविकास आघाड़ी के भीतर चल रही सीटों की रस्साकशी अब कांग्रेस के लिए गंभीर असंतोष का कारण बनती जा रही है।

 महानगरपालिका में फिलहाल प्रशासक राज है, लेकिन आगामी चुनावों को लेकर राजनीतिक दलों की गतिविधियां तेज हो चुकी हैं। इसी बीच कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) की महाविकास आघाड़ी में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और इच्छुक उम्मीदवारों में भारी बेचैनी देखी जा रही है।


इस बेचैनी का मूल कारण महाविकास आघाड़ी के तीनों प्रमुख दलों के बीच समान सीट बंटवारे को बताया जा रहा है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कहना है कि अन्य दोनों पार्टियां प्रादेशिक हैं, जबकि कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी है।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2017 में पुणे महानगरपालिका का कार्यकाल समाप्त होने के बाद से नगर निगम प्रशासकीय नियंत्रण में है। उस समय 162 सीटों वाली महानगरपालिका में कांग्रेस और शिवसेना के 10-10 नगरसेवक थे, जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के 39 नगरसेवक थे। इसके बाद राज्य की राजनीति में आए बड़े उलटफेर ने नगर निगम की तस्वीर ही बदल दी।


शिवसेना के विभाजन के बाद पुणे महानगरपालिका के सभी 10 नगरसेवक धीरे-धीरे शिंदे गुट और भाजपा में शामिल हो गए। परिणामस्वरूप उद्धव ठाकरे गुट के पास फिलहाल पुणे महानगरपालिका में एक भी नगरसेवक नहीं बचा है। इसी तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विभाजन के बाद अधिकांश नगरसेवक अदालत द्वारा मान्यता प्राप्त मूल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, यानी अजित पवार गुट, के साथ चले गए। शरदचंद्र पवार गुट के पास इस समय केवल 9 नगरसेवक शेष हैं।


भाजपा और शिंदे गुट के मजबूत गठबंधन का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस, एनसीपी (शरद पवार गुट) और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) ने महाविकास आघाड़ी का गठन किया है। पुणे महानगरपालिका चुनाव को लेकर तीनों दलों के बीच लगातार बैठकें हो रही हैं और सीट बंटवारे पर मंथन जारी है। लेकिन सूत्रों के मुताबिक यह बंटवारा मौजूदा नगरसेवकों की संख्या या जमीनी ताकत के बजाय पार्टीगत समझौतों के आधार पर समान रूप से किया जा रहा है।


सूत्रों के अनुसार पुणे महानगरपालिका की 162 सीटों में से 12 सीटें महाविकास आघाड़ी के अन्य घटक दलों के लिए छोड़ी जा रही हैं, जबकि शेष 150 सीटें कांग्रेस, एनसीपी (शरद पवार गुट) और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के बीच 50-50-50 के अनुपात में बांटने की योजना है।


कांग्रेस पार्टी के सूत्रों का कहना है कि सीट शेयरिंग में कांग्रेस को अपेक्षाकृत कमज़ोर स्थिति में रखा जा रहा है, जबकि वह एक राष्ट्रीय पार्टी है और पुणे महानगरपालिका क्षेत्र में उसका मजबूत जनाधार रहा है। दूसरी ओर शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) का पुणे में फिलहाल कोई ठोस जनाधार नजर नहीं आता। कमोबेश यही स्थिति राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) की भी बताई जा रही है। इसके बावजूद दोनों दलों को बराबर की सीटें मिलना कांग्रेस के प्रबुद्ध कार्यकर्ताओं और नेताओं की चिंता बढ़ा रहा है।
कुछ कांग्रेस कार्यकर्ता यह सवाल भी उठा रहे हैं कि कहीं “ऊपर-ऊपर” सीटें बेची तो नहीं जा रही हैं? आखिर यह खेल चल क्या रहा है? कांग्रेस को इतना कम क्यों आंका जा रहा है? क्या किसी दबाव में यह सीट शेयरिंग का समझौता हो रहा है या फिर पार्टी को नुकसान पहुंचाने की कोई साजिश रची जा रही है—ऐसे सवाल भी सूत्रों द्वारा उठाए जा रहे हैं।


कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे को लेकर तीखी नाराजगी उभरकर सामने आ रही है। पार्टी टिकट पर चुनाव लड़ने के इच्छुक उम्मीदवारों का कहना है कि जिन दलों का वर्तमान में नगर निगम में न तो कोई खास जनाधार है और न ही प्रतिनिधित्व, उन्हें भी बड़ी संख्या में सीटें दी जा रही हैं, जबकि कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ रहा है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि इससे कांग्रेस के पारंपरिक क्षेत्रों और दावेदारों के अधिकारों का हनन हो रहा है।


सूत्रों ने बताया कि पार्टी कार्यकर्ताओं में अपने ही नेताओं को लेकर जबरदस्त उबाल है। आरोप है कि सीट बंटवारे की मेज पर बैठे कुछ नेता “ऊपर-ऊपर कोई बड़ा खेल” खेल रहे हैं और कांग्रेस के मजबूत क्षेत्रों की बलि दी जा रही है। कई कार्यकर्ता यहां तक कह रहे हैं कि यदि यही स्थिति बनी रही तो चुनाव में पार्टी को भीतर से ही बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।


बहरहाल, एक ओर जहां महाविकास आघाड़ी में सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान जारी है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के भीतर भी जबरदस्त अंतर्द्वंद खुलकर सामने आ रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि पुणे महानगरपालिका चुनाव में कांग्रेस के हिस्से में आखिर कितनी सीटें आती हैं, जबकि महाविकास आघाड़ी में कांग्रेस का राजनीतिक कद अन्य दोनों सहयोगी दलों की तुलना में कहीं अधिक माना जा रहा है।
 

टिप्पणियाँ